दीर्घञ्जीवितीयमध्यायः
अथातो दीर्घञ्जीवित्तीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥१॥
इति ते हूँ स्माह भगवानात्रेयः ॥२॥
भास्करं भारती देवीमिष्टं स्वं पार्थिवेश्वरम् ।
गणेशं विघ्नहर्तारं नौमि वाग्बुद्धिशुद्धये ।।
विषय-प्रवेश-अय शब्द से मङ्गल कर लेने के बाद सर्वप्रथम दीर्घञ्जीवितीय नामक अध्याय की व्याख्या कर रहा हूँ। ऐसा भगवान आत्रेय ने कहा।।१-२।।
विमर्श - 'अन्यादौ अन्यमध्ये, ग्रन्थान्ते च मङ्गलमाचरणीयमिति शिष्टाचारः', इस आचार के अनुसार आस्तिक जन से निर्मित सभी अन्यों में सर्वप्रथम मङ्गल करने की परम्परा अति प्राचीन काल से चली आ रही है। पौराणिक युग के पूर्व अय अथवा ओम् से ही मङ्गल किया जाता था क्योंकि ओंकार और अथ इन दोनों शब्दों को माङ्गलिक माना जाता है। जैसा कि 'ओङ्कारश्चाय शब्दस द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा। कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातौ तेन तौ मङ्गली स्मृती' अर्थात् ओङ्कार और अब शब्द सर्वप्रथम ब्रह्मा के कण्ठ का भेदन कर अर्थात् उनके मुख से अनायास उच्चरित होने के कारण माङ्गलिक माने गए हैं। इसी नियमानुसार इस संहिता में अब शब्द से मङ्गल किया गया है और यह भी देखा जाता है कि तत्काल में निर्मित ब्रह्मसूत्र या उससे पूर्व ब्राह्मण अन्यों में अथ शब्द से ही ग्रन्थ का प्रारम्भ किया गया है। जैसे 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' या व्याकरण भाष्य में भी अथ शब्दानुशासनम्। अथ शब्द का अर्थ माङ्गलिक होते हुए यहाँ बाद, का भी अर्थ बतलाता है जैसा कि 'अथ शब्दः आनन्तर्यार्थे' (शब्दस्तोम)। इससे यह स्पष्ट है कि अग्निवेश आदि शिष्यों के पूछने पर ही भगवान आत्रेय ने आयुर्वेद का उपेदश किया है। अथ मङ्गल से यह भी स्पष्ट है कि यह संहिता पौराणिक काल के पूर्व में रची गयी है, क्योंकि पौराणिक युग में गणेश आदि देवता की ही वन्दना पायी जाती है इसके पूर्व अथ शब्द से मङ्गल की कामना की गयी है। यहाँ अतः शब्द से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि उत्तम कुल, शील, शौच, आचार, विनय आदि से सम्पन्न शिष्यों ने अपनी तथा प्राणिमात्र की दीर्घायु की इच्छा से भगवान आत्रेय के सामने इस वृत्त को प्रश्न रूप में उपस्थित किया है क्योंकि अतः शब्द किसी वृत्त के उपस्थित होने पर ही प्रयुक्त होता है जैसा कि 'अतः शब्दो वृत्तं किञ्चिदभिव्यञ्जयन् हेतुमर्थमभिधत्ते' कहा है। इस प्रकार दीर्घ जीवन की इच्छा से अग्निवेश आदि शिष्यों के शिष्टाचारपूर्वक प्रश्न करने पर भगवान आत्रेय पुनर्वसु ने आयुर्वेद का उपदेश देने के लिये सर्वप्रथम दीर्घञ्जीवितीय नामक अध्याय का प्रारम्भ किया क्योंकि आगे यह बतलाया जाएगा कि मनुष्य के जीवन काल में ३ एषणाएँ (इच्छाएँ) होती हैं-१. प्राण-एषणा, २. धन-एषणा, ३. परलोक-एषणा इन तीनों में सर्वप्रथम प्राण-एषणा ही आती है क्योंकि प्राण के अभाव में सभी इच्छाओं का अभाव हो जाता है इसलिए दीर्घ जीवन प्राप्त करने के लिए ऋषियों ने आयुर्वेद का उपेदश सुनना चाहा और भगवान आत्रेय ने उसी का प्रथम उपदेश किया। यहाँ आयु शब्द का अर्थ युग के अनुसार होने वाले आयु-प्रमाण का बोधक है क्योंकि जीवित और आयु यह दोनों एकार्थवाचक हैं यह शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा का संयोग स्वरूप है अर्थात् इन्द्रियादि-सम्पन्न शरीर और आत्मा के संयोग- विशिष्ट काल का ही नाम आयु है। इस आयु का प्रमाण यद्यपि 'शतायुर्वे पुरुषः' तथा 'शतं जीवेम शरद' आदि युक्तियों से १०० वर्ष की ही मनुष्य की आयु मानी जाती है ऐसा कुछ लोगों का कथन है। पर यह उचित नहीं मालूम पड़ता क्योंकि वि.स्था. के दूसरे अध्याय में सतयुग में मनुष्यों की आयु ४०० वर्ष, त्रेता में ३०० वर्ष, द्वापर में २०० वर्ष और कलयुग में १०० वर्ष की बतलायी गयी है। उसके अनुसार तथा भगवान व्यास ने भी 'पुरुषाः सर्वसिद्धार्थाश्चतुर्वर्ष शतायुषः कृते', से कृतयुग में ४०० र्न की आयु मानी है अतः शतम् पद सर्वनाम शत-वाचक है अर्थात सैकड़ों वर्ष जीने की कामना करता है या सैकड़ों वर्ष मनुष्यों
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